Friday, November 21, 2014

दिमागी अपाहिज भीड़

"ये लोग पाँव नहीं ज़हन से अपाहिज़ हैं,
उधर चलेंगे जहाँ रहनुमां चलाता है.."

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कल रात एनडीटीवी पर प्राइम टाइम देखते वक्त राहत इन्दोरी साहब का ये शेर बार बार ज़हन पर दस्तक देता रहा. संत ( ? ) रामपाल के भक्तों की मूर्खता का कोई ओर छोर ना देख पहले तो बहुत गुस्सा आया, फिर तरस और फिर डर महसूस हुआ. कैसे एक लोकतांत्रिक देश में धर्म की खाल ओढ़ कर कोई इतना समर्थ बन सकता है कि सरकारों से टक्कर ले सके ? कानून को आँखें दिखा सके ? इतनी शक्ति कहाँ से आई होगी उस मे ? यकीनन उस अंधे, भ्रमिष्ट समूह से जो वहां हाजिरी भर रहा था. उसे परमात्मा का अवतार समझ कर उसके लिए मरने मारने को तैयार था.

बारह एकड़ में फैले हुए साम्राज्य का बादशाह रामपाल क्यूँ इतना दुस्साहसी बनने की हिम्मत दिखा सका इसका पता कल प्राइम टाइम में भक्तों की प्रतिक्रियाएं देख कर पता चला. रामपाल को गिरफ्तार किये जाने के बाद जब कुछ रिपोर्टरों ने भक्तों से बात की तो उनके जवाब देख कर मुझे सख्त अफ़सोस हुआ कि मेरी खोपड़ी पर छत गिर क्यूँ नहीं रही. इतने तांडव के बाद भी बाबा के भक्तगण ना सिर्फ उसे बेक़सूर मानते हैं बल्कि ये घोषणाएं करते हैं कि बाबा जल्द ही तमाम पापियों का षड्यंत्र फेल कर के फिर से बाबागिरी का आसन संभालेंगे.

इस मूरख भीड़ को देख कर मन वितृष्णा से भर गया. लग रहा है भारत में अगर कोई नेतागिरी जितना ही प्रॉफिटेबल बिजनेस है तो वो बाबागिरी ही है. लोगों के अंध-विश्वास का दोहन कर के ऐसे लोगों ने अपनी जून संवार ली और हम हैं कि एक के बाद एक पाखंडीयों द्वारा छले जाने वाली भीड़ बन कर रह गए हैं. आस्था के नाम लगा हुआ बाज़ार हमें पता नहीं क्यूँ नज़र ही नहीं आता. मौलवियों से ताबीज़ बनवा कर सुरक्षित महसूस करने वाली, संतों के आशीष में समस्याओं का समाधान खोजने वाली ये नाकारा, निकम्मी, नीम-पागल भीड़ जब तक मौजूद है हम तरक्की के दौड़ में अव्वल आते रहेंगे. जाहिर है आखिर से.

मुझे हरयाणा पुलिस को इस बात के लिए धन्यवाद भी देना है कि उसने रामपाल की गिरफ्तारी में जल्दबाजी से काम नहीं लिया. वरना ये मति-भ्रष्ट भीड़ खुद की जान की दुश्मन बन जाती और अब छः मरे हैं तब शायद साठ या छः सौ होते. एक मुजरिम और कानून के बीच दीवार बन कर खड़ी इस भीड़ की अकल क्या सामूहिक रूप से बंधक पड़ी होगी बाबा के पास ? कितना आसान है इन लोगों के लिए राज करना. क्यूँ कि जनता तैयार बैठी है शोषण करवाने के लिए. पैसे भी पल्ले से देती है. रामपाल का किले जैसा अभेद्य साम्राज्य देख कर हैरानी होती है. अपना पॉवर हाउस, अपना अस्पताल, अनाज से भरे कोठार... तौबा..!! रविश कुमार जी के इस कथन में भले ही अतिशयोक्ति थी कि ये खाद्य सामग्री अगर बाज़ार में पहुँच जाए तो यकीनन महंगाई कम हो जायेगी लेकिन ये बात नज़र-अंदाज़ नहीं की जा सकती कि पैसों का दरिया बह रहा था वहां. कहाँ से आया ? जाहिर है उन भोले ( मूर्ख पढ़ें ) भक्तों की मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा था ये पैसा. सन्यासियों का बाना पहन कर तमाम सांसारिक सुखों को बढ़-चढ़ कर भोगने वाले इन पाखंडी बाबाओं से भी अगर हम बचना सीख जायें तो तरक्की के रास्ते पर हमें कुछ रफ़्तार जरुर हासिल होगी. वरना जो है सो हईये है..

 हाँ, अगर मेरे ये लिखने भर से भी किसी की भावनाएं आहत होती है तो उनसे अनुरोध हैं कि एक तो वो देश का नाम 'भारत देश' से बदल कर 'आहत देश' रख लें और मुझे अपनी मित्रता सूची से तुरंत रवाना करे. मुझे उस भीड़ का हिस्सा नहीं बनना जो वोटिंग वाले दिन तो पिकनिक मनाती है लेकिन बाबाओं के सत्संग के लिए ऑफिस से हफ्ते भर की छुट्टी ले कर जाती है.

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